अजीब रंग में ढलती ये सियासत देखी है,

कहीं पे भूख, कहीं पे हुकूमत देखी है।


वो हाथ जोड़ के कुर्सी की भीख माँगते थे,

अब उन हाथों में हमने बग़ावत देखी है।


बदलते वक़्त ने चेहरों को बे-नक़ाब किया,

लहू की प्यासी ये कुर्सी की चाहत देखी है।


गरीब प्यासा रहा, और वो जाम पीते रहे,

हमने महलों में छलकती ये राहत देखी है।


सियासतदाँ तो बस वादों के पुल बनाते हैं,

पर PK ने यहाँ गिरती हर शराफ़त देखी है।efined