अपनी उमर-ओ-आरज़ू सब ही तमाम की,

चिलमम उठा के देखिए सूरत आवाम की।


ये वक्त के छाले फफोले तंग गलियों के,

बुनियाद है वतन के सारे तामछाम की।


गलियाँ गुज़र रहीं घरों के बीच से होकर,

ख़बरों में बेख़बर, ख़बर इनके निज़ाम की।


ये रौशनी की जिल्द में अंधेरी बस्तियाँ 

मस्ती चुराई किसने, क्यूं इनके इनके जहान की।


फुटपाथ पे नालों पे बसर गर नही वाजिब,

तो उनके हिस्से की ज़मीं किसको नीलाम की।

----प्रदीप सेठ सलिल