'मौसम का तक़ाज़ा है'
तुम अब तो आओ मेरे द्वार,
मौसम का तक़ाज़ा है,
यहाँ इस भीगती ॠतु का
ठिठोली का इरादा है।
तुम्हारे रूप की खुशबू,
इधर आई हवाओं में,
उधर तुम प्राण चुप बैठीं
विगत भर कर निगाहों में।
उमर से आ लगा यह पल
प्रणय बंधन में बांधा है,
मौसम का तक़ाज़ा है।
जो बूंदें बादलों से आ,
ठहर जाती दिशाओं में,
तुम्हें यह ढूंढती निर्मम,
मेरे गीतों की बाहों में।
कि अंबर ने इशारा कर
समय सावन से मांगा है
मौसम का तक़ाज़ा है।
--प्रदीप सेठ "सलिल"

