बहुत दिन बाद

आज

रौशनदान में पक्षी दिखे

यह तुम्हारे आगमन के चिन्ह थे,

शायद

कहीं आसपास,


बहुत दिन बाद ही

प्रांगण में 

खुलकर धूप बिखरी

यह पहचान थी

तुम्हारी मुस्कान की,


गिलहरी मोतिया पर दिखी,

हरसिंगार से होती हुई

करीब आ बैठी,

हाँ हाँ 

बहुत दिन बाद

संकेत थे

परस्पर स्मृति-स्पंदन के,


फूल भी खिले आज ही

बहुत दिन बाद

यह महक थी

प्रसन्नता की

जिसमें मैं घिरा था,


यह चिन्ह थे

तुम्हारे आगमन के

कहीं आस पास।


---प्रदीप सेठ “सलिल”