बंद दराजों में कर डाला सबने अपना काम,

फिर आ पहुंची शाम।


आसमान ने करवट बदली,

चढ़ा धूप पर रंग,

सड़कों पर आ गई ज़िन्दगी 

टूट गये अनुबंध ।

चौपालों पर सिमट विषमता मचा रही कोहराम,

फिर आ पहुंची शाम।


कमरों में सन्नाटा पसरा,

रिश्ते कतरन कतरन,

अब “टीवी” की धार काटती,

हर कोने के बन्धन।

दालानों में शून्य प्रतीक्षा ख़ारिज़ हर मेहमान,

फिर आ पहुंची शाम।


आंखों में बंध गई रिक्तता,

चुप्पी सी अधरों में,

नये तरीके यंत्र सरीखे

सरगम और स्वरों में।

व्यथा ओढ़कर, रीते मधुबन बैठे राधा श्याम

फिर आ पहुंची शाम।


--प्रदीप सेठ “सलिल”