'परेशां हूँ के मेरे ग़म तुम्हें ग़मख़्वार न कर दें'


वो ख़्र्वाबों के फ़सानों का ज़माना डूबने को है,

के चश्मे नम के दरिया में ज़माना डूबने को है।


सदां माज़ी की लहरों में भटकता चैन आ जाए,

वो गुज़रे दौर का  रौशन ज़माना डूबने को है।


वो देखा ख़्वाब था के इश्क़ से संवरेगी ये दुनिया,

मेरी उल्फ़त के सागर में ज़माना डूबने को है।



रहे हस्ती पे चलके यूं भला क्या हो गया हासिल,

के  ग़ैरत के मुहानों का  ज़माना  डूबने को है।


परेशां हूँ के मेरे ग़म तुम्हें ग़मख़्वार न कर दें,

मेरी जानिब, चलो अच्छा, ज़माना डूबने को है।


---प्रदीप सेठ "सलिल"