'उधर तुम्हारे पास आने को मन व्याकुल है आज'
उधर तुम्हारे पास आने को मन व्याकुल है आज,
मगर नदी के सारे ही पुल टूट गए हैं आज।
किसी नाव सा पाल फैलाए आ तो जाऊं मीत,
पर पीछे ले जाने वाली हवा तेज है आज।
इन्हीं कगारों की मिट्टी में कल के चित्र बने हैं,
यही लगा डर ले न जाऐं लहरें इनको आज।
विगत बिताया साथ संजोया सुधि का ताना बाना,
बूँद बूँद जोड़ा रस-सागर भला लग रहा आज।
कोई नन्हा हंस मुझे घेरे कोमल पांखों से,
विगत-परिन्दा सुधियों के तट खेल रहा है आज।
पेट, पसीना, प्यास, घेरकर मुझको हैं सब बैठे,
एक एकाकी क्षण तक अपना नही रहा है आज।
---प्रदीप सेठ सलिल

