माँ 

------


माँ

ये भी कोई तसल्ली है

कि तू हाथ फेरती रहे मेरे सिर पर

और मैं

तेरे ही साथ, तेरी ही गोद में

उदास हत्प्रभ सो जाऊं

सुबह किसी काम की तलाश को,


कब तक और कबतक

बस्ती के स्कूल के बाहर मैं जाता रहूं

रज्जू मैकेनिक के

और तू जाती रहे

घर घर बर्तन की सफ़ाई को।


माँ

उम्र का ग्राफ

आशवासन नही

खाद्य पदार्थ बढ़ाता या घटाता है

तू भी तो जानती है न,

फिर भी—


सच

तूने हाथ नही बढ़ाए

मंच तक

जो बांटते हैं

बेफ़िक्री- लोगों में।


माँ

‘कुछ हाथ इतने प्रभावशाली होते हैं’

तूने नही बताया कभी

तू जानती ही नही थी शायद,

और ये भी

कि हम छोटे हो गए हैं

उनके मुताबिक

उनके बड़े होने के निमित्त।


और माँ

संपूर्ण वातावरण कैसे बदलते हैं वे लोग

कैसे दहलीज़ के इस पार

पतझर

और उस पार

बसंत बिखरता है

तू नही जानती क्या?


अब समझौता नही होता

चुप्पी से

सुन

मेरी मुठ्ठियाँ बन्द है

इस बार ऐसे नही मरुंगा


---प्रदीप सेठ “सलिल”