कितना मुश्किल कर दिया है

पहचाना

उन शक्लों का

जो

शोर मचाती हैं

बांसों पर लटकी रंगीन कतरनों के नीचे

आदमी को आदमी से अलग करने का,


इधर या उधर

अपनी ज़रूरत के मुताबिक

मजबूर लोगों को कंदील बना

गीता कुरान चौराहों तक ला

आग लगा

हाथ तापती हैं

जलती हुई लाशों पर।


तुम भी गुनाहगार हो (राजनीतिज्ञों के संदर्भ में)

तुमने

नेम प्लेट लगाई उन दरवाज़ों पर

जिनके पीछे

नापा जाता है राजनीति का दबाव

हत्याओं के बैरोमीटर से,


तुम जानकर भी

कि

तौला जा रहा है मज़हब

जज़्बात की तराजू पर

उनकी अपनी तरह से-

हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे,

तुम भी गुनाहगार हो।


पर


आज

उभर आया है एक काम

हमारे मस्तिष्क में,

शुरूआत का

सफ़र तय करने के इरादे से,


दो बिन्दुओं की दूरी

सच है

आसान नही

सिमटकर हो जाए एक बिन्दु सम,

हाँ

एक धारा का दूसरी से गुज़रना

सहज नही तो असम्भव भी नही,


धुंधलका

बदलना ही होगा

रौशनी में,


आसान करना ही होगा

घाटियों में उतरती

पर्वतों पर चढ़ती

पगडंडियों को,


वादियों में लहराती खुशहाली के लिए,


बुलन्दी 

छू लेने के लिए,

आने वाले युगों के निमित्त।


चार दीवारी में बंद हो

काग़ज़ की नाव तैराना गर्म लावे में

किसे भाता है,

हाँ

हमें आता है

दराज़ों की निकलती गर्मी से जूझना

ऊबना 

नारों के हुजूम से।


कुछ भी असंभव नही शुरुआत के बाद

आज

उभर आया है एक काम

हमारे मस्तिष्क में।

----प्रदीप सेठ "सलिल"