“तुम्हीं रुकमणी तुम ही राधा मन के वृन्दावन में”
तुम्हीं दर्द में आंसू बनकर
गीतों में सुर व स्वर बनकर
अंतर में आ आ कर बसतीं
जाने कितने रूप बदल कर,
तुम्हीं रुकमणी तुम ही राधा मन के वृन्दावन में।
महक हवा में, चांद गगन में,
धवल चाँदनी सिंचित वन में
तुम हो, तुम आ आ मुस्काती
संवेदित करुणामय मन में,
तुम्हीं खिली कलिका हो साथी इस ड्योढ़ी निर्जन में।
सावन में बदली बन आतीं
बन बरखा बूँदें लहरातीं
कभी दामिनी सी बादल में
पल दो पल आतीं छिप जातीं
गति भी तुम हो यति भी तुम हो तुम तरंग जीवन में,
यादों के मोहक प्रसार में
सांसों के झंकृत सितार में
मादक उर को सदा थपकतीं
विरह पीर जागी पुकार में,
तुम लोरी देतीं दृग मूंदें पलकें किसी सपन में,
तुम्हीं रुकमणी तुम ही राधा मन के वृन्दावन में।
-प्रदीप सेठ "सलिल"

