"मेरी पलकों के कोने सावन से बरस रहे हैं"



स्नेहिल सुख से महकी महकी,

गतयुग की गाथा है कहती,

लो यादों की चिड़िया फिर से

खिड़की पे आकर है बैठी।


व्यथा नही वन्दन है।


तुम अश्रु  नही  समझना

है यह सुधियों  की माला,

नित्य  जपा  करता मैं 

प्रेमांगन में मतवाला।


अधरों के कम्पन कतिपय

न लहर वेदना की है,

अभिलाषा की अंगड़ाई

मुस्कान चेतना की है।


सूरज की पहली किरणें

केसरिया प्रातः की बेला,

कलियों की पलकें खुलना

तकता हूँ खड़ा अकेला।


मेरी पलकों  के कोने

सावन से बरस  रहे  हैं,

मुझको  मेरे  ही  सपने 

स्तंभित निरख रहे हैं।


आशा की मैली चादर

किस क्षण तक ओढ़े जाऊँ,

कलिका की धुन में कंटक

पहने कब तक मुस्काऊँ।


किंचित तुम समझ रही हो

मैं दिन दिन बिखर रहा हूँ,

स्मृति की पुस्तक लिखता

पल पल मैं संवर रहा हूँ।


किसको अपराधी कह दूँ 

किसको निर्दोष बताऊँ,

मैं स्वयं ही अपनी छाया 

सुधि की सरिता में पाऊँ।

---प्रदीप सेठ सलिल