'तेरी आँखों की चमक दिल में चली आती है'




तेरी आंखों की चमक दिल में चली आती है

सांझ में तेरी महक छिपके बसी जाती है।


तेरी ज़ुल्फ़ों की लटक आज भी छूती पलकें,

टूटी शाखों  पे  कई  फूल  खिला जाती है।


तेरी नटखट सी हँसी  तेरी शरारत की फुहार,

मौसम ए इश्क़ में हर सिम्त भिगो जाती है।


जब पड़ी प्यार में खोए हुए पक्षी पे नज़र

जाने क्यों एक जलन मन में बढ़ी जाती है।


आँख रोती है मुसलसल किसी चातक की तरह

‘आस' की सीप गिरे अश्क़ पीऐ जाती है।

---प्रदीप सेठ सलिल