"तेरी गज़लों में फ़ाकों की कहानी याद आती है"
वो मीलों दूर चलने की कहानी याद आती है,
सुबह से शाम तक कोई कहानी याद आती है।
वो कूड़ा बीनते बच्चे ओ उन पे तफ़सरा तेरा,
तेरी गज़लों में फ़ाकों की कहानी याद आती है।
तेरी उन सुर्ख़ आँखों से छलकते थे गरम आँसू,
परेशां, सोज़ में डूबी पेशानी याद आती है।
यहाँ छोटी सी गुलबारी में अब न ख़ार हैं न गुल,
फ़िज़ाओं की हवाओं में वीरानी याद आती है।
कहाँ माज़ी की दुनिया ओ कहाँ ये आज का आलम,
जुनून ए जद्दोजहद की रवानी याद आती है।
--प्रदीप सेठ "सलिल"

