'भीगने दो पलक यूँ ही'


भीगने दो पलक यूँ  ही,

आंख से आंसू न पोंछो।


सावनी मौसम सी सुन्दर,

नयन में  बांधे  समुन्दर ,

याद से  आंगन  सजाए

भावना को मन  लगाए,


तुम तो अपने द्वार बैठीं,

दूर  उसका  दर्द  सोंचो।

भीगने दो पलक----


दर्द में  डूबी   उमर   सब

गीत बन बहती चली अब,

टपटपाती   कल्पनाऐं

क्या  पता   कब  निभाऐं,


काग़ज़ों पर खिल रहे जो

आज  वो  सपने  न रोको।

भीगने दो पलक----


जोड़कर   बीते हुए  क्षण,

पुस्तकों में लिख रखो तम,

प्रीत का   श्रृंगार कर लो,

वेदना  स्वीकार कर  लो,


सांझ  ने   बोई   उदासी

तुम यहाँ कुछ प्यार रोपो।

भीगने दो पलक----

---प्रदीप सेठ "सलिल"