'दर्द की जाई गवाह बरसात की बातें करें'.

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अब चलो कुछ देर कुछ जज़्बात की बातें करें,

दर्द की जाई 'गवाह बरसात' की बातें करें।


ताजपोशी ख़्वाब की मिलने न मिलने की कसक,

प्यार की पूंजी नरम  लम्हात की  बातें करें।


अश्क़ से नग्में लिखा करने की हरदम कोशिशें,

उस  निरंतर  दर्द  के  अंदाज़  की बातें  करें।


हिस्सा हिस्सा जोड़ के गूंथी कहानी जिसके साथ,

उम्र  के  उस दौर  के  हमराज़  की  बातें करें।


ख़्वाब को किश्तों में जीना व संजोना  दिन ब दिन,

धीरे धीरे  रूठते  ख़्यालात  की  बातें  करें।

----प्रदीप सेठ सलिल