और फिर फूलों ने रंग बिखेरा

धूप कुलांच भरती खिड़की पर आ बैठी

शायद

यह सुबह

आज की

तुम्हारे श्रृंगार के लिए उतर आई

तुम्हारे द्वार।


सुनो

हवाओं की पद्चाप धीमे-धीमे

दिशाओं से होती

तुम तक जो आई

आहट है- एक चुप से शुभ संदेश की

कि

क्षण घुल जाऐं खुशियों में

और खुशियाँ

बुनती रहें जीवन- अविरल

श्वांस दर श्वांस।


पर्त दर पर्त

जमती रहे मुस्कान

अधरों पर

निर्मित होती रहे

एक अदद आकृति-प्रसन्नता की

तुम्हारे ईर्द गिर्द।


सौभाग्य के रेखाचित्र

तुम्हारे ही इर्द गिर्द

निर्मित हो- आकृति सरसता की।


सुनो

फिर फूलों ने रंग बिखेरा

धूप कुलांच भरती खिड़की पर आ बैठी

शायद

तुम्हारे ही समीप- आज।


---प्रदीप सेठ “सलिल”