मोतिया जूड़े में  गूंथा  मन  महक  में  बांधकर

स्नेह का प्रतिबिंब नेह की खिड़कियों में बांधकर,

कल्पना पक्षी उड़े दो ओर से संवादवश

विश्वास को कोमल सहज सुन्दर परों में बांधकर।


---प्रदीप सेठ “सलिल”