'सिर्फ रोटी को समर्पित प्राण' 


व्यस्तता कैसे सुनाऊँ,

या न सुनाऊँ,

दिन आनलाईन फाइलों में बीतता है।


क्या पता तुमको हमारे पास

एक केवल याद

को ढोना नही है,

सिर्फ रोटी को समर्पित प्राण

आज का रोना यही है,


भूख ये कैसे दबाऊं  

और यह किसको सुनाऊँ,

कि आदमी का अर्थ ही अब रिक्तता है,

दिन आनलाईन फ़ाइलों में......


शहर में शामिल मगर फिर 

यों अकेला,

ज्यों नगर में कोई रेगिस्तान फैला,

बात यह कैसे छिपाऊँ,

या न छिपाऊँ

कि जो किसी की हो न पाई,

एक छोटी सी ईकाई,

बेबसी से ढो रही अनभिज्ञता है,

दिन आनलाइन फ़ाइलों में बीतता है

--प्रदीप सेठ “सलिल”