सदियों भीतर भीतर रोया,

बालू में इक सावन ढोया।


संबन्धों   ने   बदले   बंधन,

मोती दुख का एक पिरोया।


सूख़े   पत्ते  तक  बो  डाले,

जो तेरा था उसको  खोया।


रिश्ते   संदर्भों   में   कसकर,

व्यर्थ विषम आकार संजोया।


आंखों  को  गीलाकर  तूने,

एक सकल संघर्ष भिगोया।


जो काटा गत् दौर समय ने,

फिर आने  वाले  ने बोया।

---प्रदीप सेठ "सलिल"