"रिश्तों में तपिश है यहाँ आकर के देख लें"
सहने चमन में आज वो आकर के देख लें
फूलों का दर्द एक है आकर के देख लें,
बुलबुल किसी के शोर की मोहताज़ नही है
गीतों में वज़ह सोज़ की आकर के देख लें,
बर्फ़ की तरह नही ठण्डा यहाँ का ख़ून
रिश्तों में तपिश है यहाँ आकर के देख लें,
सदियों से सन्नाटे में और मजलिस में साथ हैं
जज़बात की ज़मीन को आकर के देख लें,
झीलों पे, पर्वतों पे, हवा पे, बहार पे
उल्फ़त की चांदनी है वो आकर के देख लें,
दिल ओ जिगर को बांटना रहबर की रहबरी
इस ओर जज़्बा प्यार का आकर के देख लें।
--प्रदीप सेठ “सलिल”

