'किसका तम किसका उजियाला।'


रे बसन्त आया कलियों का

मधुर कण्ठ का पिया मिलन का

प्रणय गीत गाता नित भौंरा

पुष्प कलि किसी मृदु-चुभन का,

मेरा बसन्त आँसू की माला

किसका तम किसका उजियाला।


पुरवाई मदिरा में भीगी

हवा बनी सुरबाला निखरी

शोर मचा आया बसन्त रे

वन उपवन मादकता बिखरी,

पीर मेरी, मेरी मधुशाला

किसका तम किसका उजियाला।


दिनकर निष्प्रभ किरणों वाला

मांग रहा परिणय की हाला

कलियों पर भ्रमरों का गुंजन

हर लतिका लगती मधुवाला,

दूर प्रिया अधरों का प्याला,

किसका तम किसका उजियाला।


निशा निरंतर नयन भिगोती

निष्फल आशा व्यथा संजोती,

डाल डाल बैठा ऋतु पक्षी

भाव चिरैया अविरल रोती,

मन सूना बिन दीप शिवाला

किसका तम किसका उजियाला।

---प्रदीप सेठ “सलिल”