"औपचारिक हम"
गैस के गुब्बारे सा,
फूले इत्मीनान से,
जी रहे हम कितनी शान से।
एक बीहड़ उम्र,
जीने का अर्थ-
पीठ चढ़ी
औपचारिक शब्दों की पर्त,
सहरा के टुकड़ों को
ढांपा गुमान से,
जी रहे हम कितनी शान से।
चौखट पे बांध कर
संचित उजास,
भूल गए निज मन के
तम का हिसाब,
उजियारा टीप कर
नकली वितान से,
जी रहे हम कितनी शान से।
---प्रदीप सेठ सलिल

