"ज़र्रे को ज़मीं पर ही सितारा बना दिया"



पत्थर को उसने मोम का इक दिल बना दिया,

सहरा की गर्म रेत को दरिया बना दिया।


माथे पे रूह-ए-आब का म॔ज़र बहुत ही ख़ूब,

ज़र्रे को ज़मी पर ही सितारा बना दिया।


उनके फ़लक पे 'शम्स' न हाज़िर हुआ कभी,

औरों के आसमान पर 'अंजुम' बना दिया।


उनके बसर में झोंपड़ी की मिलकियत बहुत,

इंसानी अंजुमन को ज़र गौहर बना दिया।


झुके बदन की पीठ, तरक्की का तय्यारा,

बचपन, जवानी, पीरी को ईंधन बना  दिया।


मोहताज ख़ुद आब-ओ-हवा से फ़िर भी देखिए,

शाख़-ए-शज़र को शान से गुलशन बना दिया।

---प्रदीप सेठ सलिल