अंधेरे  से  लड़े  और  आफ़ताब  हो  गए

इंसानी  मदरसे  में  एक  किताब  हो  गए,

पतझर के दरख़्तों को वो देकर के पसीना

सावन  के  महीने  की घटा आप हो गए।

--प्रदीप सेठ "सलिल"