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"पढ़ना लिखना थम्ब के जितना........"


"स्वप्न बिके बेभाव"


आसमान से सुबह उतरकर,

आ पहुंची फुटपाथ पर,

मिले दुखों को पाँव,

ग्रहण लगा इस गाँव।


संकरी बस्ती ठौर ठिकाना,

रोटी का सब ताना बाना,

पढ़ना लिखना,

"थम्ब" के जितना-

सूखे में पानी का दिखना,

झण्डा लिखता भाग

सहरा में है नाव,

बिखरे सारे ख़्वाब।


भूख बीजने लगी पसीना,

रहन हो गया मरना जीना,

व्यथा पीटती रही ढिंढ

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