'ओ बादल शोकाकुल बादल।'


गांव गांव डग  भरते रहते,

नित्य मुसाफिर चलते रहते,

कौन डगर किस ठांव बसेरा,

बेगाना अनजाना  डेरा।

नित्य भ्रमण तुम करते बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


पृथ्वी के इस तिमिर सिंधु में,

कहां चले हो विश्व बिंदु में,

हा  कैसा यह विश्व निकेतन,

प्राणी भूल चला अपनापन।

कहां अरे तू जाता बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


नन्दन वन की कथा अकेली,

फूलों की नगरी अलबेली,

विस्फोटक पल्लव की झर झर,

नन्दनवन-मरुथल विषाद स्वर।

पथ परिवर्तन कर ओ बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


करवट लेकर बदला बादल,


चन्दा का घूंघट तू बादल,

सूरज की उष्मा का कायल,

भूतल के कलुषित बिंबों में,

लुप्त हो गए सुखमय बादल।

बंजर बिंब बदलता बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


तू पतंग, बदली अंबर की,

तुम नौका हो बिना डगर की,

तुम आंसू को मोती करते,

मोती को मुस्कान नगर की।

रमता योगी नटखट बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


ओ बादल, तू भी कुछ रो ले,

तेरा जी भी हल्का हो ले,

ओ बुद्धू, क्यों सावन तकता,

पहले प्यासी प्रिया का हो ले।

सिमट समय की बूंद में बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


ॠतुक्रम सहज संजोने वाले,

सावन में नित रोने वाले,

चलन शहर का आपाधापी,

तिनका तिनका नीड़ संजोले।

यहाँ सभी ख़ुद अपने बादल,

ओ बादल शोकाकुल बादल।


-- प्रदीप सेठ "सलिल"