ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं.


ओ! अंबर की नन्ही गुड़िया,

कौन  खेल खेला  बतला दो,

किसने  प्यार जताया  तुमसे,

क्यों  भू पर आईं समझा दो,


जान  हथेली  लेकर  फिरतीं,

ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं।


पृथ्वी की तो प्यास बुझाई,

चातक-मन की नींद चुराई,

शैशव की बचपनी सुआशा,

स्वम् पीड़ित फिर भी मुस्काईं,


सदैव बूंद नर्तनमय  दिखतीं,

ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं।


बहुत  देर  से  आस लगाये,

बैठ  थे  सपने  मुरझाए,

ओ दुखिया,  तुमने ही आकर

कलि-कलि में  स्वप्न  सजाए,


 सहज सरल मिट्टी में मिलतीं, 

ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं।


महके सावन की  शहज़ादी,

एक निमिष भर ही मुस्कातीं,

निज-अन्तर की  पीड़ा ढांपे,

तपती धरती  कंठ  लगातीं,


दर्द करो कम जिसमें घिरतीं,

ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं।


उमड़ घुमड़ कर  आने वाली,

क्या दोगी अपनी आंखों को,

भू-जीवन  बैसाखी  लेकर ,

अवलंबित करता  श्वासों  को,


क्या  पाने पृथ्वी  पर  गिरतीं,

ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं।


तू भी  देख रही क्या 'सुखदा'

मुस्काहट के शव  अधरों पर,

भाव  रहित  कल-पुर्जे बसते,

छत  छज्जे चौपाल  घरों पर,


हरी  रौशनाई   तुम  बुनतीं,

ओ! बरखा की बूंद क्यों मिटतीं।


---प्रदीप सेठ “सलिल"