नयन भर वेदना से, प्राण मुझको छोड़ न जाना।



नयन भर वेदना से, प्राण मुझको छोड़ न जाना,

समूचा स्नेह अर्पित है अधूरा छोड़ न जाना।


निरंतर भावना पलकें उठा श्रृंगार कर आईं,

तुम्हीं श्रृंगार का दर्पण अकेले छोड़ न जाना।


हृदय ने मौन वन्दन कर प्रतिपल एक वर मांगा,

समर्पित है तुम्हें आशा, समर्पण छोड़ न जाना।


प्रणय पुस्तक में चुन-चुन कर अनेकों पल संवारे हैं,

शपथ नटखट विचारों की उन्हें यूं छोड़ न जाना।


हथेली पर अभी भी उष्ण हरक़त की लकीरें हैं,

विनय बंधन की परिपाटी अजी तुम छोड़ न जाना।


--प्रदीप सेठ "सलिल"