'नयन तो पी गए सागर.....'


अधर पर गीत का नर्तन

तुम्हारी याद आयी है,

उठा फिर ज्वार पीड़ा का

तुम्हारी याद आयी है।


उधर झरनों के गुन्जन में

तुम्हारे नूपूरों की धुन,

तुम्हारे ही स्वरों के सुर

सांसों में रहा हूँ सुन।


मलय निष्ठुर हज़ारों तीर

तन पर छोड़ जाता है

न तुम हो प्राण पर तुमसे

प्रणय का एक नाता है।


मुझे यह विश्व अनजाना

तुम्हारी याद आयी है

मेरा अस्तित्व केवल तुम

तुम्हारी याद आयी है।


नयन तो पी गए सागर

ह्रदय को क्या पिलाऊँ मैं,

नही जब तुम निकट साथी

कहाँ से गीत लाऊँ मैं।


बहुत ही दूर हो प्रिय तुम

मगर फिर भी निकट इतने,

कि पल पल याद आती हो

बदल कर रूप तुम कितने।


मधुरतम गीत में कोयल

तुम्हारा नाम लायी है,

तुम्हीं हो प्राण अब मेरे

तुम्हारी याद आयी है।


आ जाओ कि धड़कन सूत्र

कोमल टूट न जाऐं

तरी ने जो छुए थे तट

वे उनसे छूट न जाऐं।


आ जाओ कि ये कण्टक

पुनः मधुबन सा बन जाए

विरह की आग में जलता

ये जीवन शलभ मुस्काए।


विगत युग के सपन लेकर

व्यथा मन द्वार आयी है

तुम्हारे ही लिए जीवन

तुम्हारी याद आयी है।


--प्रदीप सेठ "सलिल"