'निकटता के आभास अनेक'
अकेले दूर खड़े उस ओर,
विरह बादल में तुम चितचोर,
मूक रहते करते हिल्लोर,
याद में होती नित्य विभोर।
प्रणय धारा यौवन से पूर्ण,
सतत बढ़ती होने संपूर्ण,
निकटता के आभास अनेक,
प्रणय पथ हो पाया न पूर्ण।
विकल अश्रु सूखे ओ मीत,
बुझे नित मुस्काते दृग दीप,
निरत बहती भावों की धार,
कहाँ तुम मीत बुलाता प्यार।
सुबह खिड़की से झांके धूप,
निहारूं तेरा सुन्दर रूप,
रात सोते सोते मैं जाग,
निकट पाती तेरा स्वरूप।
मेरे दो होंठ हुए खामोश,
है केवल पीड़ से सन्तोष,
कहाँ खोजूं तुमको प्राणेश,
नही मुझको, स्वम् मेरे होश।
तुम्हारी ही वीथी चुपचाप,
खड़ी तकती हूँ सारी रात,
कभी जो आँख लगी अनजान,
चौंकती पा आहट अज्ञात।
बुलाती प्रीत, तू आजा मीत,
मूक होता जीवन संगीत,
विरह कारा में हूँ मैं कैद,
कहाँ तुम मेरे जीवन दीप।
नयन, सूखी सरिता सम आज,
विवशता है आँखों का साज,
शहर में हर रोटी को जंग ,
तभी तो "विरहन" हर मुमताज़।
---प्रदीप सेठ “सलिल”

