मुक्तक-


"सांझ ने धीरे से पलकों पर रखा गत युग"


स्नेह दीपक से  उजाला  कर  रहा  श्रृंगार,

गीत ग़ज़लों ने सजाया  प्रीत का हर तार,

सांझ ने धीरे से पलकों पर रखा गत युग

नयन से मन तक चली निर्मम निरत् जल धार।

---प्रदीप सेठ सलिल