मधुर वेदना चंचल आंसू
सुन्दर सुन्दर याद,
कब तक लिखूं विरह पुस्तक में
बोलो यह संवाद।
आशा का मखमली दुशाला ओढ़ रहा मन मीत,
निष्ठुर रूठी रही भावना
अपना अपना भाग।
चेहरे पर छ्प गयी उदासी अंकित भय के चिन्ह,
आंखों में पल रही शून्यता
डूब रहा विश्वास।
झूठे विज्ञापन सी चिपकी अनजानी मुस्कान,
निर्जन में आती कर जाती
बार बार उत्पात।
सुधि की दुल्हन ओढ़े बैठी श्रम की गीली चूनर,
नई सदी ने लील लिये हैं
मन के कोमल भाव।
---प्रदीप सेठ "सलिल"

