"अब न सावन अब न चातक....."


मुझे बता दो आशाओं तुमने क्या मन में ठानी

बार बार कतराता तुमसे तुम करतीं मनमानी,

अब न सावन अब न चातक अब न चाँद सलोना

अब अपनाना तुम्हें न संभव करो न आनाकानी।

---प्रदीप सेठ “सलिल”