
"प्यार की कहीं न कोई छांव है"
ज़िन्दगी का रास्ता खड़े खड़े
जाने किस तरह से तय हो रहा,
उम्र तो मिटी समय के साथ साथ
और आदमी अजब सा हो रहा।
फ़ासले तो नोंचते रहे सपन,
तन बदन को रिक्तता चबा रही,
पैण्डुलम जो चल रहा विकास का
एक दायरे में सीमित हो रहा।
कुछ ही कोस चलके रिश्ते थक गए
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