"प्यार की कहीं न कोई छांव है"
ज़िन्दगी का रास्ता खड़े खड़े
जाने किस तरह से तय हो रहा,
उम्र तो मिटी समय के साथ साथ
और आदमी अजब सा हो रहा।
फ़ासले तो नोंचते रहे सपन,
तन बदन को रिक्तता चबा रही,
पैण्डुलम जो चल रहा विकास का
एक दायरे में सीमित हो रहा।
कुछ ही कोस चलके रिश्ते थक गए
स्वार्थ की सड़क कभी न कम हुई,
प्यार की कहीं न कोई छांव है
अनमना सा ढीठ वक्त खो रहा।
ज॔गली भविष्य की चौपाल पर,
निरीह कल्पना कभी न जा सकी,
व्यथा की भीड़ हर समय लगी वहाँ
वर्तमान दर्द ढक के सो रहा।
---प्रदीप सेठ “सलिल”

