'मेरा एकाकीपन मुझपे निसार'
अनजाने दूर हुआ मन का तुषार,
किसी मौन आहट ने छेड़ दिए तार,
जान गया भाव का यह चोर भयभीत,
मेरा एकाकीपन मुझपे निसार।
सांसों के सूत्र किए जीवन को क़ैद,
व्यथित उमर रोई रात-रात बैठ,
बूढ़ी हंसी नित गाए कोई गीत,
पीड़ा को भाये यह मन का सितार,
मेरा एकाकीपन मुझपे निसार।
उड़ता रहा विहग दूर दूर दूर,
पाया न मीत कोई खग को सुदूर,
चुपचाप लौट आया अपनी मुंडेर,
अस्सीम सिन्धु मेंक्ष पाया कगार,
मेरा एकाकीपन मुझपे निसार।
कल्पित विचारों से बांधी उम्मीद,
अनचाही बात कोई तोड़ गई नींद,
मेरी ही तुष्टी मुझे भाती है आज,
अपने ही स्वप्न दिए मैंने उतार,
मेरा एकाकीपन मुझपे निसार।
--प्रदीप सेठ "सलिल"

