"मैं इधर रोटी के झंझट से घिरा हूँ"


किसने कहा के मुफ़लिसी में प्यार नही है

रोटी की तलब ईश्क़ की हक़दार नही है?

माना के ज़र्रा कर दिया गौहर को ज़ुल्म ने

रिश्तों में तपिश पर यहाँ बेकार नही है।

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आप सावन को नया आयाम देना,

हो सके तो आंसूओं को थाम लेना,

मै इधर रोटी के झंझट से घिरा हूं,

तुम किचन में आंकड़ों से काम लेना।

---प्रदीप सेठ “सलिल”