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"ख्वाबों के मेहमान बताओ"



सुधियों के आँगन के

आगन्तुक!

कैसे किया करते हैं अभिनन्दन

पक्षी किसी का,


और करती हैं स्वागत दिशाऐं कैसे-

एक लम्बी रात के बाद भोर का,

मैं निरंतर सोंचता हूँ

ओ! आँख से आने वाले आँसू,


ख़्वाबों के मेहमान

बताओ -

क्या यह क्षण संधि क्षण है?

अथवा

प्रतिबिंब है

किसी प्रतीक्षामय यात्राक्रम के अन्तिम चरण का,


कि 

वातावरण सिन्दूरी हो गया है

कि शब्द गीत हो गए हैं

कि मिलन मौन हो गया है,


बताओ! 

तुम ही बताओ कुछ- आगन्तुक,

कि क्यों 

यह परिवर्तन 

स्थाई नही हो जाता

प्यार की तरह या तुम्हारी स्मृति की तरह।

---प्रदीप सेठ सलिल