“नगर की हर मीनार नक़्क़ाशी से गिर रही”
किसके लिए है चांद चमका आसमान पे,
सारे सितारे मस्त दरबारों में काम पे।
मजबूरियों ने क्या से क्या रिश्ते बना दिए,
जो ख़ला के नक़्श टूटे ख़ुद से बाम पे।
ये भागते मंज़र शहर को ले गए कहाँ ,
के रौशनी है क़ैद अंधेरे मुक़ाम पे।
नगर की हर मीनार नक़्क़ाशी से गिर रही,
बुनियाद का पत्थर लगाएं किसके नाम पे।
लो उसने रहन फ़न किया सत्ता की सेज पर,
क़लम का क़त्ल कर दिया बेसुध निज़ाम पे।
---प्रदीप सेठ सलिल

