जोड़ कर आंचल में सावन

दर्द को अब तुम संजोलो।

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है सजन सम्भव उजाला

मन में प्रियतम प्रातः बो लो।


आंख में आंजे सपन को

बांध कर अपनी घुटन को,

अजनबी बातों के आंगन

जोड़ कर आंचल में सावन,

और कितनी देर यों तुम

भावना  के  द्वार  बोलो,

मन में प्रियतम प्रातः बो लो।


पथ खड़ा लेकर विषमता

पांव में चुभती कठिनता,

छप रही मुख पर उदासी

रह गई मुस्कान प्यासी,

याद के धागों में उलझी

काग़ज़ों पर गांठ खोलो,

मन में प्रियतम प्रातः बो लो।


ओढ़ कर अवसाद निर्मम

हो गया संचार दुर्गम,

डर गए सपने सुनहरी

रह गयी पाती अधूरी,

सांझ ने टूटन समेटी

दर्द को अब तुम संजोलो,

मन में प्रियतम प्रातः बो लो।


---प्रदीप सेठ "सलिल"