"एक स्वर्णिम युग हुए हैं आज”



दूर तक आकाश में फैला उजाला

क्यों दिलाता याद

उस मुस्कान की,

एक अन्तर तक गई पहचान की,

मन के आंगन में बसी मुस्कान की।


जो दिवस बीते तुम्हारे साथ

एक स्वर्णिम युग हुए हैं आज,

फिर भी लगती

आपके बिन

हर घड़ी सुनसान सी,

उम्र के दुरूह रेगिस्तान की,

मन के आंगन में बसी मुस्कान की।


देख कर हमने प्रणय दर्पण

अन्जली भर कर सजाए क्षण,

और फिर टूटे

कि जैसे टहनियां बेजान सी

एक बियाबान की,

मन के आंगन में बसी मुस्कान की।

----प्रदीप सेठ सलिल