"देखना दोपहर की परछाईं सा संबंध न हो"


जब परिंदे लौटकर आएं तो मुझको याद करना,

आह भरने से जी हल्का हो तो देखो याद करना।


देखना दोपहर की परछाई सा संबंध न हो,

एक सरिता की तरह तुमको है सागर में उतरना।


हर समय मुझमें मगर, मुझसे ही दूरी का चलन ये,

मैं अकेला बिन्दु परिधि की तरह तुमको है बनना।


हमने सदियों तक प्रतीक्षा की लता आयु को दी है,

बन के ख़ुशबू की तरह पलपल तुम्हीं को है बिखरना।


मन की इच्छाऐं घने जंगल सी फैली कागज़ो पर,

तुम वो हरियाली हो जिसको जंगलों में है संवरना।

---प्रदीप सेठ सलिल