"रंगीन तस्वीरें छिपातीं भूख के किरदार को"



कौन तोड़ेगा यहाँ पर  भीड़ की दीवार को,

हर गली बस्ती शहर में छद्म की मीनार को।


स्कूल की तालीम तहख़ाने में मनसबदार के,

अस्पतालों की हक़ीकत, काटते बीमार को।


अब रिसालों में, ख़बर में, इश्तहारों में यहाँ,

रंगीन तस्वीरें छिपातीं भूख के किरदार को।


अब चलो कुछ देर तरक्क़ी की बातें ही सही,

झोंपड़ी से पार देखें  शहर के विस्तार को।


हर चुनावी किश्त में आईन बांटा जा रहा,

दस्तूर को, इंसान को और भूख के इज़हार को।


फ़ाकों की दास्ताँ यहाँ पर दर्ज  है जनाब,

फ़ुरसत सियासत दे कभी आना इधर दीदार को।

---प्रदीप सेठ सलिल