"बित्ता बित्ता रिक्तता से"

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विश्राम चाहिए

औपचारिकता से

लचर व्यवहारिकता से,


उस से

डर लगा

जो अपना लगने लगा,

गली में मोहल्ले में बाजार में शहर में

सदी के इस पहर में,


हर आदमी

जिसने प्यार से देखा

तारीफ़ की

नफ़रत दिखाई,

छुआ-

धुंआ जादू तसव्वुर परछाईं,


बाहर

अंदर

निरंतर,

शायद संबंध जुड़ा

सूत्र से


प्रत्यक्ष

अप्रत्यक्ष

बांधने को

लादने को

घुटन

टूटन

बित्ता बित्ता रिक्तता से

छल तक

तल तक,


अब

तैर आयी उदासी

सतह पर

थककर,


आँखें मूंदने दो

ढूंढने दो

विश्राम

औपचारिकता से।

----प्रदीप सेठ “सलिल”