"....हमने बातें कीं या जीं"
आओ
कुछ देर
हम एक दूसरे को सिर्फ देखें
कुछ न बोलें
और फिर निरीक्षण करें
कि हमने बातें की या नहीं,
या कुछ यूं करें
आओ
हम एक दूसरे से नफ़रत करें
बहुत नफ़रत करें
और फिर पछताऐं
कि
मैं और तुम
क्यों नही बोलते,
या फिर कुछ यूं ही करें
आओ
हम एक दूसरे से बातें करें
बहुत बातें करें
पहरों तक
फिर महसूसें
कि
दो,
एक ही हो गए।
---प्रदीप सेठ “सलिल”

