शंख की घड़ियाल की और आरती की क्या कहें,

अजान की हम क्या कहें और सुबह की क्या कहें।


क्यों नही होती सुबह पेड़ों पे चिड़ियों की चहक,

इस तरक्की की फ़िज़ा में गुलिस्तां की क्या कहें।


इन  किनारों  में  सुना  करते हैं  दरिया था कभी,

लो नदी तरसी है पानी को  किसी की क्या कहें।


हाथ  पर  मेंहदी  अकेले  ही  रचा  आई  दुल्हन,

है  कहाँ  पर  छेड़खानी  भाभियों की  क्या  कहें। 


मिट  गए  दालान,  नुक्कड़,  छत्त,  घर  से कहकहे,

मस्त  रिश्तों से बने  कल के कफ़स की क्या कहें।


---प्रदीप सेठ “सलिल”