"गुज़र रहे यों दिन"
जैसे-तैसे, भीड़-भाड़ से, गुज़र रहे पलछिन,
शुरू हुआ यों दिन।
झांक रहा बादल से सूरज
बूढ़ाया आकाश,
कोलाहल घुल गया नगर में,
मौसम में संत्रास।
गयी रात जो देखे सपने
टूट गये कमसिन,
शुरू हुआ यों दिन।
दफ्तर दफ्तर बंद यातना,
कुण्ठा आंगन आंगन,
तन से चिपकी रही उमर बन
बेमानी विज्ञापन।
बेतरतीब डगर पर चलके
बढ़ना बहुत कठिन,
शुरू हुआ यों दिन।
गलियों में खप रही ज़िंदगी
सड़कों पर संताप,
घिरता गया घुटन से चिंतन
बढ़ता रहा दबाव।
धुंधलाया खुशियों का दर्पण
डूब गये सब बिंब,
शुरू हुआ यों दिन।
जैसे-तैसे भीड़-भाड़ से गुज़र रहे पलछिन,
शुरू हुआ यों दिन।
---प्रदीप सेठ "सलिल"

