"हमने दो धाराएँ कर दीं भाव के संचार की"



यों बंटे जैसे कि  टुकड़े टुकड़े कोई फूल हो,

फिर जिए एहसास में कि ज़िन्दगी एक भूल हो।


हमने दो धाराएँ कर दीं भाव के संचार की,

पर बना रहने दें, केवल एक, स्नेह के कूल को।


आज सीखें आचरण हम वृक्ष के संसार से,

टहनियां अनगिन हों पर समान सबका मूल हो।


भीत्तियों पर लिख दिए हैं  कायदे कानून सब,

पर करें वो ही जो हम सबके लिए अनुकूल हो।


झांक कर देखें विगत पीढ़ी की कोमल कल्पना,

उसके माथे का हो चंदन न कि सिर की धूल हों।

---प्रदीप सेठ सलिल