तुम्हारी याद
न जाने क्यों भली लगती है
विषम जीवन में,
बार बार
भावना
सुबह से शाम
लौट आती खाली हाथ
दस्तक दे कितने ही दरवाजों,
हाँ
कुछ अतीत के बिंब लिए
मौसम के पंखों पर,
कल्पना
किसी बचपनी अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो
में समा,
ढूंढती
केवल तुम्हें ढूंढती,
कुहासे में तैरते रेखाचित्र की आकृति में।
तुम
दूर किसी चौखट पर खड़ी
गुम सुम
भूल जातीं
कि
किसी का प्यार तुम्हें तलाश रहा है
बाहर भीतर।
तुम नही जानतीं या जानती हो
उस पार
वो
गिरकर उठकर
अनेक बार चढ़ा उतरा
स्मृतियों के तहखाने कुछ संजोने को
और
समर्पण को
सूखे हुऐ फूल
अपने कोमल संचय के,
पर
प्रतीक्षा प्रतीक्षा केवल प्रतीक्षा।
--प्रदीप सेठ “सलिल”

