"चौखट रोई सारी रात"


जेठ महिना   सिर  पे  ताप  

भूख व चिन्ता का अवसाद,

व्याकुल है श्रम व्याकुल गान  

हर पाखी  हर नीड़  विषाद। 


छेड़के   जीवन  का   संगीत  

वीणा का स्वर  स्वम् है  मौन,

तार की गाथा  तार की पीड़ा

गीत  की जड़ता  जाने कौन।


तम  की  कारा  जग  है  क़ैद   

स्वार्थ-समुन्दर   का  विस्तार,

दीपक   करता   दो  व्यवहार   

उजले   काले   दो   संसार।


छल है टी.वी  छल  के  खेल    

मन   का   रोना   अंतर्ध्यान

लम्बी डगर है    धीमी चाल

दर्द  सांझ  है   दर्द   विहान। 


नन्हे   आंसू    नन्ही   मांग

मजबूरी   से    वो   अज्ञात      

भाव, अधर   सब   संज्ञाहीन

चौख़ट   रोयी   सारी  रात।    


ए.सी   में   कुछ  पड़े  बीमार    

कुछ चल देते  बिना इलाज

उधर  तरक्की   इधर बेहाल

गूंगी।  बहरी   खबरें  आज ।


गीली  आंखें    गीले  भाग   

उनके सब सपने अभिशाप 

यहाँ घाट पर   सुख की नींद   

वहाँ  आस  को  पक्षाघात।

--प्रदीप सेठ “सलिल”