"किसका बसंत किसका पतझड़"



नज़र उठा कर देख सखी

सब ओर बासंती फूल खिले,

भौंरा  फूलों  के  कानों  में

कहता बासंती फूल  खिले।


खेतों  में  सरसों   लहराई

बागों  में  रौनक  लौट आई,

पेड़ों  पर  नृत्य  परिंदों  का

मन में एक छवि उभर आई।


दूर क्षितिज पे  सजधज के

अंबर   संमोहित   धरती   से,

सब   रंगों  का   ताना बाना,

कैसे   कह   दूं   ‘बेदर्दी’   से।


करती किरणें  संध्या श्रृंगार

पश्चिम  में  सूरज  का  विहार

करे पुष्प पुष्प का आलिंगन

'मैं' भी करती नखशिख सिंगार।


दे सखी संदेशा सजना को

"उन बिन" मेरा जग पतझड़ है।

---प्रदीप सेठ सलिल